भारत और यूनाइटेड किंगडम (यूके) के बीच आर्थिक, व्यापारिक और निवेश संबंधों को नई दिशा देने के प्रयास तेज हो रहे हैं। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दोनों देश व्यापार, निवेश और नवाचार आधारित साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए लगातार नए अवसर तलाश रहे हैं। उन्होंने कहा कि भारत और यूके ऐसा मजबूत आर्थिक इकोसिस्टम विकसित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं, जिससे उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा, उद्यमिता को बढ़ावा मिलेगा और बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों का सहयोग केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रौद्योगिकी, विनिर्माण, स्टार्टअप, कौशल विकास, हरित अर्थव्यवस्था, अनुसंधान और निवेश जैसे अनेक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में तेजी से विस्तार हो रहा है। इस साझेदारी से दोनों देशों के व्यवसायों को नए बाजार, आधुनिक तकनीक और दीर्घकालिक आर्थिक विकास के अवसर प्राप्त होंगे तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को भी मजबूती मिलेगी। इसी बीच, भारत सरकार ने दवा अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए औषध नियमावली, 1945 (Drugs Rules, 1945) में संशोधन का मसौदा जारी किया है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित इन संशोधनों का उद्देश्य वैज्ञानिक अनुसंधान, परीक्षण और नवाचार के लिए दवाओं के आयात की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बनाना है। इससे अनुसंधान संस्थानों, चिकित्सा संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, जैव-प्रौद्योगिकी कंपनियों और औषध उद्योग को नई दवाओं के विकास, क्लीनिकल रिसर्च और आधुनिक चिकित्सा अनुसंधान से जुड़े कार्यों में बड़ी सुविधा मिलेगी। सरकार का मानना है कि आयात प्रक्रिया के सरलीकरण से शोध कार्यों की गति बढ़ेगी, नियामकीय प्रक्रियाएं अधिक प्रभावी बनेंगी और भारत में दवा अनुसंधान का वातावरण और मजबूत होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के ये दोनों कदम—एक ओर भारत-यूके आर्थिक सहयोग को मजबूत करना और दूसरी ओर दवा अनुसंधान के लिए नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाना—देश की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक रूप से लाभकारी सिद्ध होंगे। इससे भारत वैश्विक फार्मास्यूटिकल अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के रूप में अपनी पहचान को और मजबूत कर सकेगा। साथ ही नई दवाओं के विकास, आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के विस्तार, विदेशी निवेश में वृद्धि और उच्च गुणवत्ता वाले अनुसंधान को प्रोत्साहन मिलेगा, जिससे भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी और अधिक सशक्त होगी।
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