गोड्डा। जब राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) लागू हुई थी, तब उम्मीद जगी थी कि अब शिक्षा का मतलब केवल किताबें रटना और परीक्षा पास करना नहीं रह जाएगा। बच्चों को उनकी रुचि के अनुसार सीखने, नए कौशल विकसित करने, स्वरोजगार और उद्यमिता की ओर बढ़ने का अवसर मिलेगा। इसी सोच के साथ पीएम श्री विद्यालय और मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालय जैसी योजनाएं शुरू की गईं। लेकिन गोड्डा जिले के स्कूलों की वास्तविक स्थिति देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या ये बदलाव वास्तव में कक्षाओं तक पहुंच पाए हैं? जिले के कई सरकारी विद्यालयों का हाल देखने पर ऐसा महसूस होता है कि शिक्षा व्यवस्था अभी भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही है। कक्षाओं में पाठ्यक्रम पूरा कराने पर तो जोर है, लेकिन बच्चों को जीवन और रोजगार से जोड़ने वाली शिक्षा कहीं पीछे छूटती दिखाई देती है। नई शिक्षा नीति में कौशल विकास, व्यवसायिक शिक्षा, डिजिटल दक्षता और उद्यमिता की जिस बात को केंद्र में रखा गया था, वह अधिकांश स्कूलों में दिखाई नहीं पड़ती। ग्रामीण क्षेत्रों के अभिभावकों से बात करने पर अक्सर एक ही चिंता सामने आती है बच्चे स्कूल तो जा रहे हैं, लेकिन उन्हें ऐसा क्या सिखाया जा रहा है जिससे वे भविष्य में आत्मनिर्भर बन सकें? स्कूलों में पढ़ रहे कई विद्यार्थियों को यह तक जानकारी नहीं होती कि उद्यमिता क्या है, स्वरोजगार के अवसर क्या हैं या स्थानीय स्तर पर कौन-कौन से व्यवसाय विकसित किए जा सकते हैं। शिक्षा विभाग की रिपोर्टों में गतिविधियों, कार्यक्रमों और नवाचारों का उल्लेख अवश्य मिलता है, लेकिन जमीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। स्थानीय शिक्षाविदों का मानना है कि जिले के अधिकांश विद्यालयों में उद्यमिता और कौशल आधारित शिक्षा पर अभी गंभीरता से काम नहीं हो रहा है। कुछ विद्यालयों में इस विषय पर प्रोजेक्ट, चार्ट या औपचारिक प्रस्तुतियां जरूर बनवाई जाती हैं, लेकिन उनका प्रभाव बच्चों के व्यवहार और सोच में दिखाई नहीं देता। पीएम श्री और मुख्यमंत्री उत्कृष्ट विद्यालयों से लोगों को काफी उम्मीदें थीं। इन विद्यालयों को शिक्षा सुधार का मॉडल बनना था, लेकिन कई स्थानों पर आज भी संसाधनों की कमी, प्रशिक्षित शिक्षकों का अभाव और गतिविधि आधारित शिक्षण की कमजोर व्यवस्था चुनौती बनी हुई है। विद्यालयों की दीवारों पर नए रंग और बाहर लगे आकर्षक बोर्ड निश्चित रूप से स्वागत योग्य हैं, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल इन्हीं आधारों पर नहीं किया जा सकता। गोड्डा एक ऐसा जिला है जहां बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में बाहर जाने को मजबूर होते हैं। ऐसे में यदि विद्यालयों में बच्चों को कृषि आधारित उद्योग, पशुपालन, डिजिटल सेवाएं, लघु उद्यम, वित्तीय साक्षरता और स्वरोजगार के व्यावहारिक अवसरों से जोड़ा जाए, तो शिक्षा वास्तव में उनके जीवन में बदलाव ला सकती है। दुर्भाग्य से यह प्रयास अभी अपेक्षित स्तर पर दिखाई नहीं देता। आज आवश्यकता केवल योजनाओं की घोषणा करने की नहीं, बल्कि उनके प्रभाव का ईमानदार मूल्यांकन करने की है। यह देखना होगा कि कितने बच्चे वास्तव में कौशल आधारित शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, कितने विद्यालयों में उद्यमिता संबंधी गतिविधियां नियमित रूप से संचालित हो रही हैं और उनका विद्यार्थियों के जीवन पर क्या असर पड़ रहा है। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य केवल स्कूलों को नया नाम देना या नई इमारतें खड़ी करना नहीं था। इसका असली लक्ष्य ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करना था जो आत्मविश्वासी, कुशल और आत्मनिर्भर बन सकें। यदि गोड्डा में इस दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो आशंका है कि शिक्षा सुधार की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं सरकारी फाइलों और प्रस्तुतियों तक ही सीमित रह जाएंगी। आखिरकार शिक्षा की सफलता का पैमाना चमकती हुई इमारतें नहीं, बल्कि वह परिवर्तन है जो एक विद्यार्थी के जीवन, सोच और भविष्य में दिखाई देता है।
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