देश के कई हिस्सों में पिछले कुछ सप्ताह से जारी भीषण गर्मी और सूखे जैसी परिस्थितियों ने खरीफ फसलों के लिए गंभीर चुनौती पैदा कर दी है। मौसम विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि धान, गन्ना, कपास, सूरजमुखी, मूंग, उड़द, सब्जियों और फलदार पौधों पर इस गर्म मौसम का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इस वर्ष अल नीनो के प्रभाव की आशंका के कारण स्थिति और भी चिंताजनक मानी जा रही है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक तापमान फसलों की वृद्धि, फूल आने की प्रक्रिया और उत्पादन क्षमता को प्रभावित करता है। विशेष रूप से कपास की फसल में गर्मी के कारण तने के आसपास पीला घेरा बनने लगता है, जिससे पौधे बैक्टीरिया और अन्य रोगजनकों के प्रति संवेदनशील हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप तना कमजोर पड़ जाता है, पौधे मुरझाने लगते हैं और कई बार पूरी फसल को नुकसान पहुंच सकता है। फलदार पौधों पर भी गर्मी का असर साफ दिखाई दे रहा है। नए लगाए गए आम, लीची, संतरा, नींबू, अमरूद और पपीते के पौधे तेज धूप और नमी की कमी के कारण सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार दक्षिण-पश्चिम दिशा से आने वाली तेज धूप सीधे पौधों के तनों पर पड़ने से 'सन-बर्न' यानी धूप से झुलसने की समस्या बढ़ जाती है। सूखे मौसम में मिट्टी और पौधों की नमी तेजी से उड़ जाती है, जिससे तनों में दरारें पड़ने लगती हैं और कई बार छाल तक उखड़ जाती है। यदि समय रहते उचित देखभाल न की जाए तो पौधे का विकास रुक सकता है या वह पूरी तरह नष्ट भी हो सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे पेड़ों के तनों पर सफेद रंग का घोल (व्हाइट वॉश) लगाएं, नियमित अंतराल पर सिंचाई करें तथा छोटे पौधों को सरकंडे, पराली या खजूर के पत्तों से बने आवरण से ढककर धूप से बचाएं। सब्जी उत्पादक किसानों को भी अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। मिर्च, भिंडी, करेला, लौकी और अन्य बेल वाली सब्जियों में अधिक तापमान के कारण फूल और फल झड़ने की समस्या बढ़ रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अत्यधिक गर्मी परागण प्रक्रिया को बाधित करती है, जिससे फल बनने की क्षमता कम हो जाती है और उत्पादन घट सकता है। कई क्षेत्रों से किसानों ने फसलों में फल गिरने और सन-बर्न की शिकायतें दर्ज कराई हैं, विशेषकर मचान पर उगाए जाने वाले करेले में यह समस्या अधिक देखी जा रही है। विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसान कम मात्रा में लेकिन बार-बार सिंचाई करें ताकि खेतों का तापमान नियंत्रित रहे। वहीं नेट-हाउस में खेती करने वाले किसान मिट्टी की जुताई और पॉलीथीन शीट से ढककर मिट्टी में मौजूद रोगजनक कीटाणुओं तथा निमेटोड्स को नष्ट करने की तकनीक अपना सकते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि समय पर सिंचाई, पौधों की सुरक्षा और वैज्ञानिक सलाह का पालन करके किसान गर्मी और सूखे के दुष्प्रभाव को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
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